ढोंग





अब मुझे मेरा कमरा,

ये आईना,

चारदीवारी,

और वो लोग, जिन्हें मैं अपना कहता हूँ—

कोई नहीं जानता।


कोई नहीं जानता

कि मैं सुबह दरवाज़े की घंटी बजने से पहले ही जाग गया था,

और रात को तकिया मोड़कर

सोने की एक ईमानदार कोशिश की थी।


ख़ैर, ईमानदारी भी एक ढोंग है।

मैं ढोंगी हूँ—ये लोग जानते हैं।

मैं बेहद बदतमीज़ हूँ—ये भी लोग जानते हैं।

बस, मैं कौन हूँ—

ये लोग नहीं जानते।


मैं भी ख़ुद को नहीं जानता।

मैं नहीं जानता

कि अब मैं अक्सर किसकी तलाश में रहता हूँ—

अपनों की,

समय की,

या पैसों की।


या फिर

मैं जानता हूँ कि मैं कौन हूँ,

और सिर्फ़ बातें बना रहा हूँ।

© जयेन्द्र दुबे 

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